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क्यों टूट गया बिजली विभाग? राजस्थान की बिजली का काला सच | पूरा इतिहास विस्तार से।

 क्यों टूट गया बिजली विभाग? राजस्थान की बिजली का काला सच | पूरा इतिहास विस्तार से। 


1. राजस्थान तब रियासतों में बँटा हुआ था।
2. उस समय बिजली का मतलब सिर्फ़ ‘शानो-शौकत’ था, कोई ज़रूरी जरूरत नहीं।
3. रात होते ही काम बंद हो जाता था और दिन ढलते ही लोग घरों में चले जाते थे।
4. अगर चाँद न हो, तो हाथ को हाथ नहीं दिखाई देता था।
5. पूरा बिजली सिस्टम RSEB (Rajasthan State Electricity Board) के कंट्रोल में था।
6. फिर पहली बार राजस्थान में बिजली के मीटर लगाए जाने शुरू हुए।
7. कंपनी को कहा गया कि अब “प्राइवेट की तरह चलो — खुद कमाओ, खुद चलाओ।”
8. लेकिन हालात ऐसे बने कि बिजली व्यवस्था को प्राइवेट कंपनियों के हाथों में सौंपना पड़ा।
9. क्योंकि राजस्थान डिस्कॉम्स पर ₹77,453 करोड़ का भारी घाटा हो गया था।
10. स्मार्ट मीटर लगने के बाद लोगों को ज़्यादा बिल आने लगे।
11. ठेकों में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगने लगे।
12. खराब मीटर और गलत बिलिंग की शिकायतें लगातार बढ़ती गईं।




आज हम एक बटन दबाते हैं और बिजली जल जाती है 
लेकिन सोचिए… क्या हाल था जब राजस्थान में बिजली **नाम की चीज़ भी नहीं थी. 

 1950 से पहले का राजस्थान*, जब बिजली एक “अलौकिक” चीज़ लगती थी।


# ⭐ 1. राजस्थान तब रियासतों में बँटा था

आज राजस्थान एक राज्य है, लेकिन 1950 से पहले यह **कई रियासतों** में बँटा हुआ था:

* जयपुर रियासत
* जोधपुर
* बीकानेर
* जैसलमेर
* उदयपुर
* कोटा
* बूंदी
* टोंक… और कई छोटी रियासतें

हर रियासत की अपनी सरकार थी, अपने राजा और अपने नियम–कायदे।

**इसका असर बिजली पर भी पड़ा**:
👉 किसी के पास थोड़ा पैसा था तो वो अपने इलाके में थोड़ी व्यवस्था बना लेते थे।
👉 ज्यादातर जगह बिजली नाम की चीज़ थी ही नहीं।

---

# ⭐ 2. बिजली का मतलब सिर्फ "शहरों के कुछ हिस्से"

दोस्तो अगर आप सोच रहे हैं कि शहरों में बड़ी-बड़ी बिल्डिंग है बिजली से चमकती होंगी…तो ऐसा बिल्कुल नहीं था।

उस समय: राजस्थान में केवल कुछ मुख्य शहरों के थोड़े हिस्सों में ही बिजली थी।

* छोटे कस्बों और गाँवों में बिजली = "बिल्कुल नहीं थी"।
* उस दौर के सरकारी डॉक्यूमेंट बताते हैं कि
  **बिजली केवल 42 जगहों तक पहुंचती थी** और
  **कुल बिजली उत्पादन सिर्फ 13.27 मेगावॉट था।

आज के हिसाब से यह बहुत कम है — आज राजस्थान हजारों मेगावॉट बिजली पैदा करता है।

 बिजली एक “शानो-शौकत” थी… जरूरी चीज़ नहीं

आज बिजली एक जरूरत है, लेकिन तब बिजली को लोग luxury (शानो-शौकत) मानते थे:

* महलों में थोड़ी बिजली होती थी
* बड़े अमीर व्यापारी अपने घरों में जनरेटर जैसी मशीनें रखते थे
* आम लोगों ने तो बल्ब कभी देखा भी नहीं था
* रात में घरों में दीये, लालटेन, चिराग ही जलते थे
* शादी–समारोह भी लालटेन से होते थे
* दुकानों में मिट्टी के तेल वाले लैंप इस्तेमाल होते थे

लोगों का कहना था कि—
हमारे लिए सूरज ही बिजली है। यानी रात होते ही काम बंद, दिन ढले ही लोग घरों में।

  गाँवों का हाल दोस्तों, उस समय गाँवों की स्थिति बहुत अलग थी:

* कोई पंखा नहीं
* पानी के लिए मोटर नहीं
* खेतों में सिंचाई बैलों और कुओं से
* स्कूलों में शाम की पढ़ाई नहीं
* हैंडपंप, घेर, कुंआ ही सब कुछ

और हाँ —रात में अंधेरा इतना होता था कि अगर चाँद न हो, तो हाथ को हाथ नहीं दिखता।



तो बिजली कैसे आती थी? 

कुछ बड़े शहरों में बिजली के छोटे-छोटे प्लांट लगाए जाते थे:

* 50 किलोवॉट
* 100 किलोवॉट
* या कभी-कभी 500 किलोवॉट

ये बिजली कहां देते थे सिर्फ…

* महाराजा का महल
* कुछ सरकारी दफ्तर
* शहर की मुख्य सड़क
* रेल स्टेशन (कुछ जगह) यह मैं शेरों की बात कर रहा हूं गांव में नहीं बस। पूरे शहर को बिजली देना — नामुमकिन था।

कुछ रियासतों में राजा खुद आधुनिक सोच रखते थे। उन्होंने शुरुआत करवाई:

जैसे —

* जयपुर रियासत में जापान/ब्रिटिश से इंजीनियर बुलाए गए
* उदयपुर में 1930–40 के बीच छोटे पावर हाउस बने
* बीकानेर में भी सिटी पॉवर हाउस चलाए गए थे

लेकिन यह पूरी बिजली नहीं सिर्फ छोटे क्षेत्र तक सीमित थी।
पूरे राज्य में एक “सिस्टम” नहीं था —हर रियासत अपना छोटा सेटअप बनाती थी।

आज की भाषा में कहें: तो "हर घर का मीटर–लाइन–डिवीजन जैसा सिस्टम तब कहीं नहीं था। और इसका मेन कारण था राजस्थान का भौगोलिक हालात

1930 से 40 के समय मे 

* रेगिस्तान
* दूर-दूर गाँव
* लंबी दूरी
* नदियाँ कम
* उद्योग कम
* पैसा कम

इन कारणों से बड़े बिजली प्लांट और लंबी तारें बिछाने का खर्च बहुत बड़ा था। इसलिए सरकारें (रियासतें) इसे अफोर्ड नहीं कर पाती थीं।


तो उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि पूरे राजस्थान के लिए बिजली का प्लान बना तो

जब सभी रियासतें मिलकर राजस्थान राज्य बना (1949से1950), तब सरकार ने पहली बार सोचा पूरे राज्य को एक बिजली सिस्टम चाहिए। क्योंकि जो राजा थे वह अपने अपने रियासत के बारे में सोचते थे सबसे पहले बिजली देने की पहल राजा सवाई मानसिंह ने की थी, लेकिन यह केवल जयपुर शहर तक ही सीमित थी।

1951–1956 के बीच योजनाएँ बनती रहीं, लेकिन कोई एकीकृत विभाग नहीं था।

उसके बाद में सबसे बड़ा कदम आया 1957 में… जुलाई 1957 — बिजली विभाग की असली शुरुआत ओर इस दिन बना:

RSEB – Rajasthan State Electricity Board

इसका काम था—

* बिजली पैदा करना (Generation)
* बिजली को दूर-दूर तक पहुंचाना (Transmission)
* घरों व दुकानों में बिजली देना और बिल बनाना (Distribution)

इस समय पूरा बिजली सिस्टम RSEB के कंट्रोल में था।

शुरुआत में बिजली कैसे दी जाती थी? कि

शुरुआती पावर प्लांट मे

शुरुआत में छोटे-छोटे थर्मल प्लांट और डीज़ल जनरेटर लगाए गए, ताकि शहरों और कस्बों में बिजली दी जा सके।

उसके बाद में लाइनों का नेटवर्क धीरे-धीरे गाँवों तक बिजली पहुँचाने के लिए

* 11kV लाइन
* 33kV लाइन
* 132kV लाइन लगाई गईं। 

पहले पूरे राजस्थान में ट्रांसमिशन बहुत कमजोर था।

अब जो मिटर है सबसे पहले मीटर कैसे लगे थे?

1. मैनुअल मीटर (Electro-Mechanical Meter)

पहले दौर में **काले रंग के पुराने मीटर** लगाए जाते थे।
इनके अंदर एक **एल्युमिनियम की डिस्क** होती थी जो घूमती थी।

▶ डिस्क जितनी तेजी से घूमे → उतनी बिजली ज्यादा खपत
▶ डिस्क जितनी धीरे घूमे → कम बिजली खपत

यह मीटर बिल्कुल घड़ी की तरह था। यह कैसे काम करता था?
करंट और वोल्टेज से एक चुंबकीय फील्ड बनती थी**
इससे डिस्क घूमती थी
डिस्क जितना घूमती → उतने यूनिट दर्ज होते थे

मीटर में एक **काउंटर** होता था जो जैसे-जैसे डिस्क घूमती थी, वैसा-वैसा नंबर दिखाता रहता था।

पहले बिजली की गणना (बिलिंग) कैसे होती थी?

पहले बिलिंग पूरी तरह **हाथ से (मैनुअल)** होती थी।

 सबसे पहले मीटर रीडर आता था

वह मीटर का नंबर कॉपी में लिखकर चला जाता था उसके बाद पिछले महीने और इस महीने के रीडिंग का फर्क मान लो:

* पिछले महीने 1200 यूनिट
* इस महीने 1340 यूनिट

तो खपत = 140 यूनिट

इन सब के बाद यूनिट रेट के हिसाब से बिल बनाया पहले स्लैब नहीं होते थे। बिजली एक समान दर पर मिलती थी। इसके बाद बिल हाथ से बनाया जाता था कागज़ पर पेन से बिल लिखे जाते थे।

अब दोस्तों 1960–1990: मे RSEB का फुल कंट्रोल था इन 40 सालों में RSEB ने:

✔ बड़े थर्मल पावर प्लांट बनाए
✔ गाँवों तक बिजली पहुँचाई
✔ ट्रांसफॉर्मर लगाए
✔ लाइनें बदलीं
✔ मीटरिंग सिस्टम मजबूत किया

इन ही सालों में राजस्थान में बिजली की सबसे ज्यादा प्रगति हुई। 1990–2000 मे ही कंप्यूटराइजेशन की शुरुआत हुई 

* मीटर रीडिंग को कंप्यूटर में फीड किया जाने लगा
* बिल कंप्यूटर से निकलने लगे
* मीटर थोड़े आधुनिक बने

और दोस्तों इसके बाद हुआ था बड़ा बदलाव साल
2000 के बाद सरकार ने बिजली बोर्ड को 5 हिस्सों में बाँट दिया 

1. **RVUNL** – बिजली बनाती है
2. **RVPNL** – बड़ी लाइनों से बिजली पहुँचाती है
3. **JVVNL** – जयपुर डिस्कॉम (शहरों में सप्लाई)
4. **AVVNL** – अजमेर डिस्कॉम मे
5. **JdVVNL** – जोधपुर डिस्कॉम मे

अब बिलिंग, मीटरिंग और सप्लाई डिस्कॉम देखते हैं।
आज बिजली मीटर कैसे काम करते हैं? वे इलेक्ट्रॉनिक/स्मार्ट मीटरहैं। इनमें:

✔ घूमने वाली डिस्क नहीं
✔ करंट और वोल्टेज सेंसर लगे होते हैं
✔ डिजिटल स्क्रीन पर यूनिट दिखती है
✔ रीडिंग ऑटोमैटिक निकलती है
✔ अब धीरे-धीरे प्रीपेड मीटर भी लग रहे हैं

अब इसके साथ ही बहुत सारी समस्या भी होने लगी
सन 2000–2005 के बीच कई अखबारों में ये हेडलाइनें थीं:

“बिजली मीटर घोटाला!”

“इलेक्ट्रॉनिक मीटर से जनता परेशान!”

“नए मीटर गलत रीडिंग दे रहे हैं!”

कई ज़िलों में मीटर चेकिंग कैम्प लगाए गए।

सन 2000 में नए मीटर लगाने पर
शिकायतें, विवाद और मीडिया न्यूज मे आईं।

✔ कुछ मीटर खराब भी मिले, लेकिन
पूरे राजस्थान में कोई बड़ा घोटाला साबित नहीं हुआ। था  


1957 में RSEB – Rajasthan State Electricity Board बना। इस समय: बिजली बनाना

बिजली खरीदना

लाइनें बिछाना

सबस्टेशन चलाना

बिल वसूली
सब कुछ सरकार करती थी।

उस समय भारत में निजी कंपनियाँ बिजली के काम में नहीं थीं, इसलिए सिस्टम पूरी तरह सरकारी था। अब बिजली विभाग अगर पुरा सरकारी था तो फिर ऐसा क्या हुआ कि इसको प्राइवेट कंपनियों के हाथों में देना पड़ा था

 तो हुआ यह था कि धीरे-धीरे बड़ी समस्याएँ पैदा हुईं. राजस्थान का बिजली विभाग हर साल हजारों करोड़ का नुकसान करने लगा। क्यों? Ki

किसानों को फ्री या सस्ती बिजली

चोरी बहुत ज्यादा

पुरानी लाइनें – ज्यादा लाइन लॉस

कर्मचारी खर्च बहुत ज्यादा था

सरकारी सिस्टम घाटे में डूब गया।था

पुराने प्लांट और पुरानी टेक्नोलॉजी

पावर प्लांट पुराने हो गए थे

ट्रांसमिशन लाइनें पुरानी

डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम कमजोर हो गया था

इनको सुधारने के लिए बहुत पैसा चाहिए था, जो राज्य सरकार के पास नहीं था। और इसके साथ ही राजनीतिक दखल bhi huwa

नेताओं की वजह से:or

मीटर बदलने में देरी 

चोरी पकड़ने में दिक्कत होती थी पॉलिटिक्स के चलते रेट बढ़ाने पर विरोध होने लगा था इससे विभाग चलाना और मुश्किल हो गया।


और तब आया बिजली एक्ट 2003

भारत सरकार ने 1998–2003 के बीच समझा:“अगर बिजली सरकारी विभाग के हाथ में रही, तो यह कभी ठीक नहीं होगी।”इसलिए Electricity Act 2003 आया।

इस कानून मैं यह था कि

✔ बिजली बनाने (Generation) और
✔ बिजली बेचने (Distribution)

दोनों में प्राइवेट कंपनियाँ भी भाग ले सकती हैं।

राजस्थान सरकार ने RSEB को तोड़कर 5 नई कंपनियाँ बना दीं (2000–2004) सरकार ने कहा कि:“बड़ा विभाग तोड़ दो – छोटे-छोटे विभाग बनाओ ताकि हर एक अपना काम अच्छे से करे।” इसलिए RSEB टूटकर बना 


RVUNL – बिजली उत्पादन (Generation)

अब बिजली बनाने का काम एक कंपनी करेगी।

✔ 2. RVPNL – बिजली ट्रांसमिशन (Transmission)

400kV–220kV की बड़ी लाइनें एक कंपनी संभालेगी।

✔ 3. JVVNL – Jaipur Discom

शहरों और गांवों में बिजली पहुंचाना।

✔ 4. AVVNL – Ajmer Discom
✔ 5. JDVVNL – Jodhpur Discom


इन 3 कंपनियों को कहा गया: कि“अब आप प्राइवेट की तरह चलो – खुद कमाओ, खुद चलाओ।” मतलब वे पूरी तरह निजी नहीं हुईं, लेकिन सरकारी होते हुए भी प्राइवेट स्टाइल में चलने लगीं।

लेकिन लोगों ने कहा कि बिजली विभाग पूरी तरह से प्राइवेट हो गया to ऐसा नहीं हुआ था राजस्थान की बिजली 100% प्राइवेट नहीं हुई। लेकिन सिस्टम में प्राइवेट पार्टिसिपेशन आया।

कहाँ कहां प्राइवेट आया?

मीटर लगाने का काम ओर लाइन बिछाने के ठेके स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट ओर बिलिंग और कलेक्शन सिस्टम ओर जो सबस्टेशन का मेंटेनेंस नए सोलर/विंड प्लांट इसके साथ जो बिजली खरीदने में प्राइवेट कंपनियाँ देखी थी

इसका फायदा: यह हुआ था कि

✔ सरकार पर बोझ कम हो गया
✔ तेजी से काम होने लगा
✔ फंड आसानी से मिलता है

और नुकसान भी हुआ था जैसे 

❌ ठेके में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे
❌ खराब मीटर, गलत बिल मिलता था लोगों को
❌ प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर हो गए थे

अब कंपनी अगर प्राइवेट लोगों के हाथों में थी तो जो लोग नौकरी कर रहे थे वह सरकारी नौकरी रही थी या प्राइवेट हो गई थी नहीं! बिलकुल नहीं।
जो भी कर्मचारी 1957 से लेकर 2000 तक RSEB में काम करते थे…

✔ वे पहले भी सरकारी कर्मचारी थे
✔ और RSEB टूटने के बाद भी सरकारी ही रहे
✔ सिर्फ कंपनी का नाम बदला — नौकरी सरकारी ही रही
✔ किसी को प्राइवेट कंपनी में शिफ्ट नहीं किया गया. 


कर्मचारियों को बस नई कंपनी में भेज दिया गया:

कुछ को RVUNL (Production)

कुछ को RVPNL (Transmission)

बाकी को JVVNL / AVVNL / JDVVNL (Distribution)

लेकिन:

👉 सैलरी सरकारी
👉 PF सरकारी
👉 पेंशन सरकारी
👉 नियम–कायदे सरकारी
👉 पद सरकारी था

कुछ भी प्राइवेट नहीं हुआ। बिजली विभाग बिका नहीं था।
सिर्फ इसका ढांचा बदला गया था। पुराने सभी कर्मचारी सरकारी ही रहे — किसी को प्राइवेट नहीं किया गया।
प्राइवेट सिर्फ ठेका काम में आया, नौकरी में नहीं।”


इसके बाद में एक बहुत बड़ी चीज हुई थी जिस वजह से विभाग घाटे में चला गया था 

बिजली बनाने का खर्च बढ़ गया

कोयला, गैस, पार्ट्स, मशीनें — सब महंगे होते गए।
लेकिन कंपनी ने पहले से तय कर रखा था कि “सरकार को इतने रेट में बिजली बेचेंगे।”

जब खर्च बढ़ा और बेचने का रेट वही रहा →
👉 कंपनी LOSS में चली गई।


सरकार से Payment TIME पर नहीं मिला कई बार:

डिस्कॉम पानी में

सब्सिडी लेट

बिल का पैसा समय पर नहीं मिला

प्राइवेट कंपनी के पास पैसा अटक गया →
👉 वे भी घाटे में गईं।

चोरी + लाइन लॉस कम नहीं हुए

कंपनी की उम्मीद थी कि:

“मीटर बदलेंगे → चोरी कम होगी →ओर हम बचत करेंगे।”

लेकिन राजस्थान में कई जगह चोरी कम नहीं हुई →
👉 कंपनी को जो बचत चाहिए थी, वो नहीं मिली
👉 और ऐसे LOSS बढ़ गया

अब इतना ज्यादा लॉस होने के बाद में कंपनियों को तो पैसा वापस वसूलना था. प्राइवेट कंपनी सीधे जनता से बिल नहीं वसूल सकती थी। लेकिन उसके पास दो तरीके थे, और दोनों का असर जनता के बिल पर पड़ा।


पहला तरीका यह है ki कंपनी बोलती थी:

“हमारा नुकसान हुआ है, हमारा पैसा दो।”

सरकार/डिस्कॉम:

PPA की शर्तें देखते

कंपनी को नुकसान का कुछ हिस्सा देते ह

ये पैसा सीधे जनता से नहीं लिया जाता है लेकिन सरकार यह खर्च आगे बिलों में जोड़ देती है।


और दूसरा तरीका यह था कंपनी बोली:

“हमारी बिजली बनाने की लागत बढ़ गई है, हमारे रेट बढ़ाओ।”

Or ERC (Electricity Regulatory Commission) रेट बढ़ा देता है।

मतलब:

👉 कंपनी की भरपाई होती है or
👉 जनता के बिल बढ़ जाते हैं


फिर जनता ने तीन तरीके से विभाग को पैसे दिए 

1. बिल बढ़ गए

क्योंकि: FCA (Fuel Cost Adjustment) बढ़ा

फिक्स चार्ज बढ़े

पावर खरीद महंगी हुई

मीटरिंग/स्मार्ट मीटर लागत भी जोड़ी गई

इससे जनता ने बोला:

“कंपनी ने हमसे वसूली की।”

असल में:

👉 कंपनी को घाटा →
👉 सरकार ने भरपाई की →
👉 सरकार ने यह खर्च जनता पर डाल दिया। 



इसके बाद स्मार्ट मीटर चार्ज जुड़ गए

कई जगह स्मार्ट मीटर निजी कंपनी ने लगाए।
उनकी लागत वापिस लेने के लिए:

मासिक चार्ज

किराया

सर्विस चार्ज

बिलों में जोड़ दिए गए।


3. जनता को कभी-कभी ज्यादा बिल आने लगे

क्योंकि:

नए मीटर तेज रीडिंग दिखाते

पुरानी लाइनें + खराब वायरिंग → बिल बढ़ जाता

चार्ज बढ़ने से कुल बिल भारी हो गया

जनता को लगा कि “कंपनी लूट रही है।”

Economic Times में एक रिपोर्ट है जिसमें बताया गया कि राजस्थान डिस्कॉम्स का घाटा बहुत बड़ा है ( उस आर्टिकल में में ₹77,453 करोड़ की बात कही गई है)

आज भी हमारे बिजली विभाग की हालत क्या है राजस्थान की बिजली कंपनियों (discoms) बहुत बड़े कर्ज में हैं — लगभग ₹ 90 हज़ार करोड़ से ऊपर।

नए बिजली रेट्स में कुछ राहत है (500 यूनिट तक), लेकिन परिचालन बोझ और चार्जेस के कारण मध्यम और बड़े उपभोक्ताओं का बिल बढ़ सकता है।

नया “Regulatory Surcharge” लोगों के बिजली बिल को प्रभावित कर रहा है।

कुल मिलाकर, डिस्कॉम्स अभी भी वित्तीय दबाव में हैं, और यह दबाव एक हिस्से में जनता के ऊपर आ रहा है।  


आज के टाइम में कितना बिल आता है to देखिए.  

अगर कोई घर 60 यूनिट बिजली खपत करता है → उसका बिल लगभग ₹ 490 हो सकता है।

अगर एक परिवार लगभग 200 यूनिट बिजली खर्च करता है → उसका अनुमानित बिल ₹ 1,685 है।

और अगर कोई घर 500 यूनिट तक बिजली लेता है → उसका अनुमानित बिल लगभग ₹ 4,280 तक हो सकता है।


इसके बाद में दोस्तों राजस्थान राज्य सरकार ने 2010 के बाद “सोलर एनर्जी डेवलपमेंट पॉलिसी” बनाई।

इसका उद्देश्य था: रेगिस्तान की धूप का इस्तेमाल करके सस्ती और साफ बिजली बनाना।

कंपनियों ने Phalodi में पहला बड़ा प्रोजेक्ट (50 MW) शुरू किया।

राजस्थान में सोलर पैनल लगाने से जनता को काफी फायदा हुआ है। घर और छोटे बिजनेस दोनों में बिजली बिल में लगभग 30–50% तक की बचत हुई है, साथ ही ग्रामीण और दूर-दराज़ इलाकों में बिजली कटौती की समस्या कम हुई है। इससे न केवल पैसे की बचत हुई है, बल्कि लोग स्वयं अपनी बिजली खुद बनाने लगे हैं, जिससे ऊर्जा पर निर्भरता कम हुई और पर्यावरण भी साफ‑सुथरा बना है।









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